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नेपाल का यह 2,500 साल पुराना मंदिर, आस्था और पर्यटन का अनूठा संगम है चाांगुनाारायायण टेंपल

चांगुनारायण मंदिर, नेपाल समुद्र तल से 1,372 से 2,191 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह नेपाल का प्रसिद्ध पुरातान तीर्थ स्थल है। इस मंदिर का निर्माण लिच्छवी राजा हरिदत्त वर्मा ने 323 ईसा पूर्व में किया था। चांगुनारायण मंदिर को चंगुनारायण, चम्पक नारायण, और गरुड़ नारायण के नामों से भी जाना जाता है।
09:10 AM Dec 10, 2023 IST | BHUP SINGH
नेपाल का यह 2 500 साल पुराना मंदिर  आस्था और पर्यटन का अनूठा संगम है चाांगुनाारायायण टेंपल

चांगुनारायण मंदिर, नेपाल समुद्र तल से 1,372 से 2,191 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह नेपाल का प्रसिद्ध पुरातान तीर्थ स्थल है। इस मंदिर का निर्माण लिच्छवी राजा हरिदत्त वर्मा ने 323 ईसा पूर्व में किया था। चांगुनारायण मंदिर को चंगुनारायण, चम्पक नारायण, और गरुड़ नारायण के नामों से भी जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण धातु, लकड़ी, पत्थर, और ईंटों से हुआ है। यह नेपाल का प्रमुख पर्यटन स्थल भी है और 1969 में यूनेस्को विश्व सम्पदा की सूची में शामिल किया गया है।

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समुद्र तल से 1,372 से 2,191 मीटर की ऊं चाई पर स्थित चांगुनारायण मंदिर नेपाल के प्रसिद्ध पुरातन तीर्थ स्थलों में से एक है। प्राचीन पुरातात्विक शिला स्तम्भ के रूप में प्रसिद्ध यह मंदिर भक्तपुर जिले में स्थित है। चांगुनारायण मंदिर का निर्माण 323 ईसा पूर्वलिच्छवीकाल के राजा श्री हरिदत्त वर्मा ने करवाया था। यह मंदिर के वल ऐतिहासिक-कलात्मक और धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि यह नेपाल का प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। काठमांडू घाटी में स्थित सात विश्व धरोहरों में से चांगुनारायण मंदिर भी एक है। काठमांडू घाटी में स्थित अन्य मंदिरों में से सबसे प्राचीन इस मंदिर को सन 1969 में यूनेस्को विश्व सम्पदा की सूची में रखा गया है।

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मंदिर का इतिहास

चांगुनारायण मंदिर को चंगुनारायण, चम्पक नारायण तथा गरुड़ नारायण आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रागैतिहासिक काल में इस मंदिर का क्या नाम था इस विषय में कोई नहीं जानता है। लिच्छवी काल में इस मंदिर का नाम डोला शिखर स्वामी था। इसके पीछे एक कारण यह था, चांगुनारायण मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है उस पहाड़ी को डोलागिरीर और इस मंदिर के देवता को यहां के लोग पहाड़ी का स्वामी मानते थे।

इसलिए इस मंदिर को डोला शिखर कहते थे। मल्ल राजा के शासनकाल को मल्ल काल कहते हैं। इस काल में चांगुनारायण मंदिर का नाम नेपाली भाषा में कथिन था। नेपाली भाषा में ‘चाँप’ (मजबूत लकड़ी वाली पेड़ वर्ग की एक वनस्पति है।) को ‘च’ और वन को ‘गुं’ कहते हैं। बाद में चंगुनारायण शब्द का अपभ्रंश होकर चांगुनारायण हो गया। संस्कृत भाषा में इस मंदिर को चंपक नारायण कहते हैं।

नागा नक्काशी से सुसज्जित है प्रवेश द्वार

मुख्य मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव, अष्ट मातृका, छिन्नमस्ता, किलेश्वर और कृ ष्ण के मंदिर भी हैं। मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं और इन द्वारों की सुरक्षा शेर, सरभ, ग्रिफिन और हाथियों जैसे जानवरों के आदमकद जोड़े करते हैं। भगवान विष्णु के दस अवतारों और अन्य मूर्तियों को छत को सहारा देने वाले स्ट्रट्स में उकेरा गया है। प्रवेश द्वार नागा (सांपों) की नक्काशी से सुसज्जित है। मुख्य प्रवेश द्वार (यानी पश्चिमी प्रवेश द्वार) पर, हम एक पत्थर के खंभे के शीर्ष पर चक्र, शंख, कमल और खड़ग हैं। इन पत्थर के खंभों पर संस्कृत में एक शिलालेख है। यह शिलालेख नेपाल का सबसे पुराना शिलालेख माना जाता है और पत्थर शिलालेख स्तंभ 464 ईस्वी में लिच्छवी (राज्य) राजा मनदेव द्वारा बनवाया गया था।

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चांगुनारायण मंदिर की शिल्पकला

चांगुनारायण मंदिर नेपाल की मौलिक शैली पैगोड़ा में बना है। नेपाल में मंदिर निर्माण की मौलिक शैली पैगोडा शैली है। यह मंदिर लिच्छवीकालिन वास्तुकला का नमूना भी है। चांगुनारायण का मंदिर चतुष्कोण आकार का है। यह मंदिर दोमंजिला है। इस मंदिर की निचले मंजिल की छत टायलों से बनी हुई है तथा ऊपरी मंजिल की छत पीतल से बनी चादरों से निर्मित है। दोनों मंजिलों में मझले आकार की खिड़कियां तथा 40 चौकोर आकृति बनी हुई हैं। प्रत्येक आकृति में तीन तरह की मूर्तियां खुदी हुई हैं। पहली मंजिल में भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की पत्थर से बनी मूर्ति है। इस मंजिल में चारों दिशाओं में चार मुख्य द्वार हैं। प्रत्येक मुख्य द्वार के दायें और बांये एक-एक दरवाजा है, जो नहीं खोला जाता। पश्चिम का मुख्य द्वार प्रायः खुला रखा जाता है। मुख्य द्वार के दायें और बाएं गंगाजी, यमुनाजी तथा अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

ऐसे हुआ मंदिर का निर्माण

चांगुनारायण मंदिर का निर्माण लिच्छवीकाल में राजा हरिदत्त वर्मा ने किया था, लेकिन लिच्छवीकालीन दूसरे लिच्छवि राजा मानदेव ने विक्रमी संवत 521 (सन 464) में चांगुनारायण मंदिर में गरुड़ जी की मूर्ति स्थापना कर अभिलेख रखा था। उसी समय लिच्छवी राजा मानदेव ने मंदिर के लिए भूमि दान की थी। इस बात का उल्लेख उनके द्वारा चांगुनारायण मंदिर में रखे गए अभिलेख में है। राजा मानदेव ने चांगुनारायण के मंदिर में स्वयं की एवं उनकी पत्नी की मूर्ति भी लगवाई थी। मंदिर निर्माण की सामग्री में धातु का कम तथा लकड़ी पत्थर और ईटों का अधिक प्रयोग किया गया है। धातु का प्रयोग के वल मुख्य द्वार लड़ियों और मंदिर के शीर्ष भाग पर नुकीली शिरा पर ही किया गया है।

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मंदिर का 2017 में किया गया जीर्णोद्वार

समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्वार होता रहा है। मध्यकाल में राजा शिव सिंह की रानी गंगारानी और 18वीं शताब्दी की शुरुआत में कांतिपुर नगर के शासक भास्कर मल्ल के शासनकाल में चांगुनारायण मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया गया था। 2015 के विनाशकारी भूकंप के कारण मंदिर की ऊपरी छत क्षतिग्रस्त हो गई थी। साथ ही काफी नुकसान भी हुआ था। तत्पश्चात इस मंदिर का जीर्णोद्वार 2017 में करवाया गया।

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